Sunday, August 28, 2011

जो मैंने किया ....

 देखो एक चिड़िया थी 
छोटी और निरीह 
बैठी मेरे खडकी के पल्ले पर 
हिलती डुलती
चहकती फुदकती
आसमान को निगलती
मेरे तुम्हारे चाहरदीवारी में 
बंद किस्मतों पर हंसती रही. 

सोचिये ...

सोचिये तो ज़रा 
कोई क्यूँ मेरी मुस्कराहट का दाम लगाता है
कोई क्यूँ मेरे होने के मानी निकालता है
मैं तो सिर्फ जीने की कोशिश कर रहा हूँ
और मेरा मन?
वह तो कुछ कहता ही नहीं. 



धुप की महक

देखा मैंने कच्ची धुप 
उस पहाड़ की मुंडेर पर 
चाहा बढ़ा कर
थाम लूं मुट्ठी भर महकती धुप
महक गया बदन बदन
हाथ आया कुछ भी नहीं.