Thursday, February 16, 2012

ख्वाब टूटे से

किसी से कहिये मेरा अक्स उतारे अपने घर के शीशे में
मेरी भी तबियत कुछ अच्छी हो जाएगी .
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पूछा किसी से अपना ही पता तो क्या कहिये
उन्होंने बता दिया घबरा  कर  अपने घर का पता.
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इस तरफ से आती है उनसे  महकी हवा
छू कर देखा तो हवा कुछ गीली सी लगी.
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महकी हुई बयार का नाम क्या दीजिये
और नहीं कुछ तो तुम्हारा नाम ही दे देते हैं.
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लश्कर -ए ख्वाब मुझे छेड़ते रहते हैं
एक और हसरत अब वाकया बन गया लगता है.






Wednesday, February 8, 2012

उफ़ यह इंतज़ार...

तकते रहिये घडी और वक़्त गुजरे नहीं
इस इंतज़ार को क्या कहेंगे.
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उनका न आना भी एक रिवाज़ सा हो गया था
यह हम थे की फिर भी पुरसुकून करते जाते थे इंतज़ार.
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एक उनकी हंसी, एक उनके बदन की नमकीन खुशबू
सब याद है मुझे अपने कतरों में 
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मैंने भी सोचा थाम लूं वक़्त को
मगर खोली मुट्ठी तो पाया सिर्फ महकता रेत
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ज्यों जाड़े की कच्ची धुप और बंद आँखें
मेरी आगोश में नरम पीली धुप और तुम. 


कैसे कहूं

वह जो हमारा भी है और तुम्हारा भी
वह जो आदि भी है अनादी भी
वही जो सुन्दर भी है और सत्य भी
वही जो है भी और नहीं भी
मेरे ही होने से निकल कर
मेरे न होने का बना प्रमाण
मेरे होने न होने से अगर कुछ होता तो
न होता कुछ भी अब तक तो 
बाकी  न रहता कुछ भी
सब अशेष, कुछ रहा रहा सा
मेरे हाथों से फिसलते रेत जैसा 
सब कितना भरा भरा, कितना रीता.

Tuesday, February 7, 2012

कुछ नहीं

कुछ इस तरह से बीत रही है यह ज़िन्दगी
जैसे पलटते हैं खुली किताब के पन्ने
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हम ने देखा अपने माजी के फ़साने उड़ते हुए
सूखे हुए पत्तों का बना लिया तकिया हमने
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एक कहानी थी सुनी अपने बचपन में कभी किसी से
आज फिर रोने का जी क्यूँ कर रहा है
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कुछ हसरतें हैं जो अनबुझी प्यास की तरह मंडराती हैं आस पास
मेरे लिए नहीं सही, किसी और के लिए ही सही, मुस्कुराओ तो
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रात भर जगा रहता हूँ क्यूँ आज कल
यह कौन है जो मेरे लिए दुआएं माँगता है.

Sunday, January 29, 2012

जो भविष्य था

जो मैं था वह अब कहीं नहीं है
कड़ाके की ठण्ड में ढूंढता रहा मैं
मसलता रहा हाथ और करता रहा  कोशिश आग उगाने की
कुछ आया नहीं हाथ
बस वही खड़ा अकेला मैं अपने खालीपन को भरने का उपक्रम करता रहा
और थक गया.
फिर सोचा
क्यूँ न चल कर आगे
अपने भविष्य  में
देखें क्या होता है मेरे आज का
नीला पेड़ मुस्कुराया मेरी  सोच पर
पत्ते लगे हिलने
छोटे से एक अनजान पौधे ने तब 
कानों में धीरे से कहा
लम्बी कतार है उस काउंटर पर
तब तक तो भविष्य वर्त्तमान  हो ही जाता है.
विस्मृत इस खोज पर
ताकता आसमान को
स्तम्भ सा खड़ा वहीँ
मैं सोचता रहा 
शुन्यता का अद्भुत एहसास 
जो नहीं था मगर अब है और नहीं रहेगा
कड़ाके की ठण्ड में जो म्देती नही आगाज़ 
तपती गर्मी का
उफ्फ्फ कितनी विषमता है.



Thursday, January 5, 2012

चांदनी की राहों पर



बस एक हम है रत कि चांदनी में रौशनी थामे   
ज़रा छू कर देखो इस अंगारे  की तबस्सुम 
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कहते हैं इस राह पर जो चला वही खोया
चलो देखते हैं यह रह जाती कहाँ तक है
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एक बार तुमने कहा था मोम कि तरह क्यूँ पिघल जाते हो
मैंने जलते मोम में डाल कर हाथ जाना उसकी तासीर 
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मेरे अरमानों को छू कर देखो तो
नदी के पार साहिल के गिले रेत सा क्यूँ है
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मेरे वजूद का क्या ठिकाना, क्या पता
ढूंढता रहा, और इस मोड़ पर ठहर गया मैं 
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मैंने सोचा क्या था मुझमे जो वह छोड़ गया मुझे
पलट कर देखा तो लगा मेरा साया गायब था
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मुझे याद आती है उन गलियों के पेचीदगियां 
जिनमे घूम कर हमने सीखा था सीधे राह चलना
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Wednesday, December 14, 2011

रुको तो ज़रा ..


मेरे माजी से आती सदा
मेरे दीवानेपन  का  पूछती  सबब
क्या  बताऊँ  मैं
मुझे  तो कुछ  भी याद नहीं
फिर हटा कर फूलों को
पढ़े  सरे  सफे  तो याद आया
यह  तो वही  है
जिसने  भरे  बाज़ार में झुकी आँखों से
दिल भर कर देखा था
देने को था हाथ में एक ख़त
और लरजती ज़बान से कहा था
रुको तो...

रोको तो ज़रा ..

मेरे माजी से आती सदा
मेरे दीवानेपन  का  पूछती  सबब
क्या  बताऊँ  मैं 
मुझे  तो कुछ  भी याद नहीं
फिर हटा कर फूलों को
पढ़े  सरे  सफे  तो याद आया
यह  तो वही  है
जिसने  भरे  बाज़ार में झुकी आँखों से
दिल भर कर देखा था
देने को था हाथ में एक ख़त
और लरजती ज़बान से कहा था
रुको तो...

Friday, November 25, 2011

पग डंडियाँ


न  हो सड़क
तो नयी पग डंडियाँ बन आएगी
जी, उगा ली नयी रेखाएं मैंने हथेलियों पर
जैसे खींच आई सिलवटें मेरे माथे पर
उम्र का तकाजा नहीं
यह चेहरे का बदलत स्वरुप
ज्यों घटता बढ़ता चाँद 
ज्यों गरीब की घटती  और दुकानदार की बढ़ती आमदनी .
मेरे दोस्त मुझ पर अब यकीन न कर
मेरे हाथो में तलवार नहीं कलम आ गयी है
मेरे सर पर गाँधी टोपी नहीं
लाल कफ़न आ गया है
ले कर कुदाल और खुरपी मैं
उगाने निकल पड़ा हूँ पग डंडियाँ 
देखो तो मेरे हाथों की रेखाएं
अब और भी गाढ़ी हो चली हैं.

Tuesday, November 22, 2011

देखो तो!

कल सुबह से
बारिश है की थमती नहीं
कल रात से कालिमा है कि रूकती नहीं
एक साल से और भी है फ़साने
दिल पर भारी भारी से
सोचता रहा मैं कई दिनों से
होती रही बारिश सारी रात
बरसते रहे अँधेरे
औंधे मुंह गिरते रहे फ़साने
तब, करने को कुछ नहीं
सिर्फ धुंध
और धुंधलापन
जैसे किसी यौवन का आवारापन
दीखता है सब
समझता कुछ नहीं.