Friday, November 13, 2009

में में में

एक बकरी मिमियाती
हदस में अधिक घास खाती
प्यास से तड़पती
बेचारी को क्या पता
कब वोह किसी के डिनर प्लेट पर सज जाए
और कीजिये आत्मा परमात्मा पर चर्चा।

इस शाम के बाद

एक सुबह ने पूछा मुझसे
कब तक सूरज ढलेगा
कब रात होगी
कब मैं सो जाऊंगा?
मैं क्या बताता
अब से थोडी ही देर में
सारा रोमांस ढल जाएगा
रात गहरी हो जायेगी
फी करना इंतज़ार सुबह की रौशनी का।

Wednesday, November 11, 2009

एक कुत्ते की यात्रा

सड़क पर एक कुत्ता दूसरे कुत्ते से बोला

कहाँ जा रहे हो

दूसरा कुत्ता चुपचाप चलता रहा

पहले ने फिर पूछा

बताओ

कहाँ जा रहे हो

कुत्ते मैं ने मुड़ कर

और बोला

धोबी का कुत्ता हूँ कहाँ जाऊंगा ?
मैं ने कुछ नही कहा
सब समझ गया।

Sunday, November 8, 2009

गाड़ी में पेट्रोल नही है तो क्या हुआ?

एक राज नेता ने पूछा
ड्राईवर गाड़ी क्यों नही चलाते
ड्राईवर बोला सर गाड़ी में पेट्रोल डालने को पैसे नही हैं सरकार के पास
नेता चोंके
ऐसा कैसे हो सकता है
कल ही तो मैंने पाँच सौ करोड़ रुपये
स्विस बैंक में जमा करवाए हैं।

कहानी एक भूत की

एक भूत था बहुत उदास
सोचता था कैसा है यह माहौल यहाँ का
हर आदमी डरावना लगता है
सीधे उसके पैर मगर उलटी उनकी चाल
हम तो मारों का खून पीते हैं
यह तो जिंदा को खा जाते हैं
इतने दिन हो गए भूत हुए हमें
अभी तक स्विस अकाउंट क्यों नही खुला हमारा?

एक परी कथा

एक जंगल में
एक परी खो गई
उसने बड़ी तलाश कर एक खुरपी निकाली
लगी खोदने और मिला उसे गडा हुआ खजाना
तब उसे मालूम हुआ
क्यूँ इन्द्र भगवान रोज तडके जंगल की सैर को जाते हैं.

सोचो तो

गाय ने पूछा बकरी से
क्यूँ तुम ही हुए जिबह हर बात पे यहाँ
बकरी ने मुह झुका कर कहा
भली गाय, तुम हिंदू हो
इस लिए कत्ल से बच गई।
गर्व से कहो हम हिंदू हैं.

Friday, November 6, 2009

भूरे साहब से एक मुलाक़ात

सरकार ने तरेर कर कहा
बोलो?
घरीब आदमी घबराया
कुछ नही हुज़ूर
बस यूँ ही
सरकार सोचते हुए से बोले
'ह्म्म्म्म'
और कलेक्टर सब से मुलाक़ात ख़तम हो गई.

कितने मोड़ और?

राहों में नही है

अब और कोई मोड़

सुना है इस सिम्त अब राहें हैं बेगानी

न हो छाँव तो धुप ही सही

मुझे कहाँ अब एहसास है अब जीने के एहसास का

एक तुम हो तो है बाकी जश्ने बहारा

एक तुम हो तो है मेरे लबों पे कुछ थिरकन

एक सूरज की रौशनी में मैं हूँ।






Thursday, November 5, 2009

बहुत दिन हुए

एक अरसा बीता है तुमसे
दो चार हुए
एक तनहा सा दिल
एक भीड़ का सा एहसास।
तालाब का पानी भी कम पड़ रहा है
मेरे अरमानो के गीले होने के लिए
सूखे पत्तों पर गिरे भी ओस की बूँदें तो क्या कीजे
समेट लीजे मेरे दर्द अपनी अंजुली में
मगर फिर भी यह याद रहे
मेरे वजूद में लगे हैं टाँके
मेरे होश को ले गया कोई चील अपने चोंच में दबा कर
चलो इन्ही ख्यालो
को दे कर परवाज़
भर कर बाँहों में एक सारा आसमान
और मुट्ठी में भरी हो आग
चलो छु कर देखते हैं इस आग की तासीर।